जो देता है, वही जीता है
एक समय की बात है, एक हरे-भरे जंगल में एक बड़ा और ख़ूबसूरत सा आम का पेड़ था, जिसका नाम “असख़िया” था। उसकी घनी शाख़ाएँ बादलों को छूती मालूम होती थीं, और उसकी चौड़ी, सायादार टहनियाँ मानो किसी को भी अपनी आग़ोश में लेने के लिए तैयार रहती थीं। असख़िया अपने मीठे और रसीले फलों के लिए दूर-दूर तक मशहूर था। जब हवा चलती, तो उसकी पत्तियाँ सरसराती हुई ऐसे लगतीं जैसे कोई मधुर गीत गा रही हों।
असख़िया की शाख़ाओं पर बुलबुल अपना घोंसला बनाकर अपने नन्हे बच्चों को चहचहाना सिखाती, तो कोयल अपनी सुरीली आवाज़ में गीत गाकर पूरे जंगल को मंत्रमुग्ध कर देती। उसकी टहनियों पर नन्ही चिड़ियाँ झूला झूलतीं, गिलहरियाँ उछल-कूद करतीं, और मोर अपनी रंगीन पूँछ फैलाकर नाचते। उसकी जड़ों के पास हिरन और ख़रगोश आराम करते, तो बन्दर उसकी डालियों पर उधम मचाते। गर्मी के मौसम में मुसाफ़िर उसकी घनी छाँव में बैठकर राहत पाते, और बच्चे उसके नीचे बैठकर कहानियाँ सुनते।
सुबह की पहली किरण के साथ ही ओस की बूँदें उसकी पत्तियों पर मोतियों की तरह चमक उठतीं, और जैसे ही सूरज ऊपर चढ़ता, उसकी छाँव में ठंडी हवा बहने लगती, जिससे हर कोई राहत महसूस करता। उसकी डालियों से टपकने वाली मीठी आमरस की बूँदों पर तितलियाँ मँडरातीं, और कभी-कभी एक नटखट तोता आकर उसका मीठा आम चोंच में दबाकर उड़ जाता।
असख़िया के पास जो भी आता, वह उसे अपनी छाँव, अपने फल और अपनी ठंडी हवा का तोहफ़ा दिए बिना जाने न देता। वह दूसरों की मदद करके बेहद ख़ुश रहता, क्योंकि उसकी ज़िंदगी का यही मक़सद था—सबको ख़ुशी और सुकून देना। असख़िया को इस बात पर बहुत इत्मीनान होता था कि वह दूसरों की ज़रूरतें पूरी कर पा रहा है।
एक दिन, जंगल में कपट नाम का एक कौआ आया। कपट ने असख़िया को देखा और सोचा, "यह पेड़ जितना बड़ा और फलदार है उससे कहीं ज़्यादा फ़ैयाज़ और सख़ी है। अगर मैं इसे अपने जाल में फँसा लूँ, तो इसका सारा फल मैं अपने हिसाब से इस्तेमाल कर सकता हूँ।"
कपट ने मुस्कुराते हुए असख़िया से कहा, "असख़िया, यार तुम बहुत फ़ैयाज़ और दानी हो, लेकिन क्या तुम्हें पता है कि यह जंगल तुम्हारी फ़ैयाज़ी और सख़ावत का नाजायज़ फ़ायदा उठा रहा है? बहुत जल्द तुम्हारे फल ख़त्म हो जाएँगे, और तुम्हें कोई याद भी नहीं करेगा। तुमसे से पहले भी यहाँ एक 'जव्वाद' नाम का बहुत ही सख़ी (उदार) पेड़ हुआ करता था। वह भी तुम्हारी तरह अपने फल सबको लुटाता रहता था, मगर जब वह बूढ़ा हो गया तो एक दिन बेरहम इन्सानों ने उसे काट दिया। अगर तुम समझदार हो, तो अपने फल सिर्फ़ उन्हीं को दो जो इसके लायक़ हैं। जो तुम्हारा एहसान मानें, तुम्हारी तारीफ़ें करें। बाक़ी सबको मना कर दो।"
यह कहकर कपट ने असख़िया की तारीफ़ों के पुल बाँधने शुरू कर दिये। असख़िया को अपनी तारीफ़ें सुनकर शुरू में तो थोड़ी झिझक सी महसूस हुई, लेकिन धीरे-धीरे उसे मज़ा आने लगा। अब तो असख़िया कपट का हो गया और उसने जानवरों और परिन्दों को फल देना बन्द कर दिये। वह सिर्फ़ उन्हीं को फल देता जो उसकी तारीफ़ें किया करते थे।
एक दिन हिरन का एक होनहार सा बच्चा असख़िया के पास आया। उसका नाम चंचल था। उसने देखा कि असख़िया के पास चापलूस क़िस्म के परिन्दे बैठे असख़िया की तारीफ़ों के पुल बाँध रहे हैं, और असख़िया बदले में उन्हें एक-एक फल दे देता है।
चंचल यह देखकर थोड़ा ठिठका, लेकिन वह असख़िया के पास जाकर बोला, "असख़िया अंकल मेरी दादी बीमार हैं अम्मा ने उनके लिये एक फल मँगाया है। आप मुझे उनके वास्ते एक मीठा सा आम दे दीजिये।"
"तुम्हें क्या लगता है यहाँ पर आम फ़्री बँटते हैं, चलो जाओ यहाँ से, यहाँ कोई आम-वाम नहीं मिल रहे हैं।" असख़िया ने तड़ककर जवाब दिया।
चंचल इस जवाब की उम्मीद नहीं कर रहा था, वह हैरान हो कर बोला, "अंकल आप तो बिलकुल बदल गए हैं, आप तो पहले ऐसे नहीं थे। आप तो बड़े फ़ैयाज़ और दाता थे।"
असख़िया ने कहा, "हाँ, अब मुझे समझ में आ गया है, मैं अपने फल यूँ ही बेकार में बाँट दिया करता था, मेरे फल बेकार थोड़े हैं कि यूँ ही बाँट दूँ। मेरी मेहनत और क़ाबिलियत इनमें लगी है।"
चंचल ने बहुत नरमी और मासूमियत के साथ बोला, "क्या कहा अंकल! क्या ये आम सिर्फ़ आपकी मेहनत और क़ाबिलियत का फल हैं?"
असख़िया ने अकड़कर जवाब दिया, "हाँ, हाँ! बिल्कुल, ये सब आम मेरी क़ाबिलियत का ही तो फल हैं।"
चंचल मुस्कुराया और बोला, "नहीं असख़िया अंकल, ये आपकी बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है। ज़रा सोचिए, अगर सूरज अपनी रोशनी और गर्मी न देता, तो क्या आपकी शाख़ों पर फल लग पाते? सूरज की रोशनी से ही तो आपके पत्तों में फ़ोटोसिंथेसिस होता है, जिससे आपको खाना मिलता है। अगर ये प्रोसेस ही रुक जाए, तो आपकी शाख़ें सूखने लगेंगी और आपकी ज़िन्दगी मुश्किल हो जाएगी।"
असख़िया थोड़ा झेंप सा गया, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
चंचल ने आगे कहा, "अंकल ज़रा सोचिये अगर चाँद और सितारे रात को अपनी ठंडक न देते, तो ज़मीन की नमी कैसे बनी रहती? पौधों को सिर्फ़ धूप ही नहीं, बल्कि ठंडक और रात की नमी भी चाहिए ताकि गर्मी और ठण्डक का बैलेंस बना रहे। और अगर बारिश न होती, तो आपकी जड़ें कैसे पानी पीतीं? आपको पता है कि ज़मीन से पानी चूसकर ऊपर तक पहुँचाने के लिए आपकी जड़ों में कैपिलरी एक्शन और ट्रांसपिरेशन पुल काम करता है? अगर ये प्रोसेस न होता तो आप कभी भी फल नहीं दे पाते।"
अब असख़िया गहरी सोच में पड़ गया।
"आपको मालूम है ज़मीन ने आपको मज़बूती दी, आपकी जड़ों को सहारा दिया, और आपको Nutrients (पोषक तत्व) दिए। मिट्टी में मौजूद नाइट्रोजन, फ़ॉस्फ़ोरस, और पोटैशियम जैसे मिनरल्स आपको बढ़ने में मदद करते हैं। हवा ने आपकी पत्तियों को ताज़गी दी, ताकि आपकी शाख़ों स्टोमाटा (छिद्र) से गैसें आ-जा सकें। मधुमक्खियों और तितलियों ने आपके फूलों में पॉलिनेशन किया, जिससे आपके फल बन सके। अगर ये सब न होते, तो क्या आप अकेले ही इतने मीठे और रसीले आम दे पाते?"
असख़िया को जैसे किसी ने अथाह गहराइयों में गिरने से थाम लिया हो। उसने अपनी शाख़ों को देखा, फिर आसमान की तरफ़ और फिर ज़मीन की तरफ़। पहली बार उसे अहसास हुआ कि सच में, ये सब कुछ अकेले उसकी मेहनत का नतीजा नहीं था। उसे सूरज, चाँद, ज़मीन, बारिश, हवा और न जाने कितनी और चीज़ों का सहारा मिला था। वह गहरी सोच में पड़ गया कि आख़िर उसे किस बात का ग़ुरूर हो गया था।
चंचल मुस्कुराया और बोला, "देखा असख़िया अंकल, असल ख़ुशी देने में है, न कि एहसान जताने में। जिस तरह ये सारी चीज़ें आपको बिना किसी शर्त के देती हैं, वैसे ही आपको भी देना चाहिए।"
"और हाँ अंकल! हमने आप जैसे ही बुज़ुर्गों से सुना है कि देता वही है जो ज़िन्दा होता है, जो मर जाता है वो देना भी भूल जाता है। और जो इसलिये देता है कि लोग उसकी तारीफ़ें करें तो इस पूरे जंगल का मालिक उसे औंधें मुँह भड़कती आग में झुलसा देगा।"
असख़िया की आँखें नम हो गईं। उसे लगा जैसे किसी ने उसे ज़िन्दगी लौटा दी हो। उसने धीरे से अपनी शाख़ झुकाई और बहुत प्यार से सबसे मीठा आम चंचल को पेश कर दिया। उसने उसी वक़्त फ़ैसला किया कि वह फिर से पहले की तरह खुले दिल से अपने फलों को बाँटेगा।
उस दिन के बाद, असख़िया फिर से पहले की तरह दरियादिल हो गया। उसके आम खाने वाले परिन्दे और जानवर लौट आए, और जंगल फिर से ख़ुशहाल हो गया।