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*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

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हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

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*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

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हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

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*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

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हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

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*माहौलियाती बोहरान और इस्लाम* अल्लाह तआला ने इस पूरी कायनात को हिकमत और ख़ूबसूरती के साथ पैदा किया है। ये कायनात एक बाग़ की तरह है और अल्लाह इस बाग़ का माली है। इस बाग़ में हर चीज़ तरतीब, सलीक़े और एतिदाल (संतुलन) के साथ रखी गई है। आप क़ुरआन पर नज़र डालें तो साफ़ तौर पर अल्लाह फ़रमाता है: “उस (अल्लाह) ने जो कुछ भी पैदा किया, बहुत ही ख़ूबसूरती के साथ पैदा किया” (सूरह अस-सजदा: 7)। एक और जगह फ़रमाया : “फिर बार-बार निगाह दौड़ाओ, क्या तुम्हें कोई दरार नज़र आती है? निगाह थककर नामुराद लौट आएगी।” (सूरह अल-मुल्क: 3–4)। यानी अल्लाह के इस बाग़ में कोई झोल नहीं, कोई कमी नहीं, सब कुछ नज़ाकत और पूरे एहतिमाम के साथ बनाया गया है। इस कायनात का एक छोटा-सा हिस्सा ये दुनिया है, जिसे इंसान के रहने और इम्तिहान के लिये बनाया गया है। अल्लाह ने इंसान को इस दुनिया में अपना ख़लीफ़ा मुक़र्रर किया है। “मैं ज़मीन में एक ख़लीफ़ा बनाने वाला हूँ” (सूरह अल-बक़रा: 30)। इंसान को अक़्ल, सूझ-बूझ और तमीज़ दी गई ताकि वो इस बाग़ की हिफ़ाज़त करे, इसकी ख़ूबसूरती को बरक़रार रखे, और इसकी हर नेमत का सही इस्तेमाल करे। मगर इसी अक़्ल का ग़लत इस्तेमाल करके इंसान इस बाग़ में बिगाड़ भी पैदा कर सकता है। अगर इंसान अक़्ल और शुऊर का सही इस्तेमाल करे तो इससे दो फ़ायदे होते हैं — पहला ये कि ये दुनिया एक ख़ूबसूरत, सलीक़ेदार और रहने लायक जगह बनी रहती है जिससे इंसानों को राहत, अमन और सुकून हासिल होता है। दूसरा ये कि इस बाग़ का माली यानी अल्लाह उससे ख़ुश होता है, और उसकी इस ज़िम्मेदारी और समझदारी के इनाम के तौर पर उसे उससे भी बेहतर एक और दुनिया (बाग़) अता करेगा जहाँ वो हमेशा रहेगा। लेकिन अगर इंसान अपनी अक़्ल का ग़लत इस्तेमाल करे और इस बाग़ में फ़साद फैलाए, इसे गंदा करे, नेमतों की नाक़द्री करे और ताबाही मचाए, तो इसके भी दो नुक़सान होंगे — एक ये कि ख़ुद उसे भी और उस जैसे दूसरे लोगों को भी इस दुनिया में रहने और बसने में परेशानियाँ और मुश्किलात पेश आएँगी, और दूसरा ये कि इस बाग़ का माली, अल्लाह तआला, उस इंसान से नाराज़ होगा और उसे उस बाग़ का हिस्सा नहीं बनाएगा जो उसने नेक बन्दों के लिए तैयार किया है। बल्कि चूँकि उस इंसान ने बग़ावत का रवैया इख़्तियार करके इस बाग़ की नाक़द्री की, इसलिए उसे भी नाक़द्र बना दिया जाएगा और कबाड़ख़ाने (जहन्नम) में औंधे मुँह फेंक दिया जाएगा। इसीलिए क़ुरआन इंसान को बार-बार इस बाग़ (ज़मीन में) फ़साद से रोकता है और इस्लाह की हिदायत करता है। “ज़मीन की इस्लाह के बाद उसमें फ़साद मत फैलाओ” (सूरह अल-आराफ़: 56)। एक और जगह फ़रमाया : “ख़ुश्की (ज़मीन) में और पानी (समंदर) में फ़साद फैला उन कामों की वजह से जो लोगों के हाथों ने किए…” (सूरह रोम: 41)। यानी जब माहौलियाती आलूदगी (Environmental Crises) पैदा करे यानी पेड़ काटे, पानी गंदा करे, हवा में ज़हर घोले, ज़मीन को बंजर बनाए और जानवरों की नस्लें ख़त्म करे तो इससे ज़मीन में फ़साद बरपा होता है — और यह सीधे तौर पर अल्लाह की बनाई हुई दुनिया से बग़ावत है। इसलिए नबी करीम ﷺ ने हमें बार-बार तालीम दी कि इस कायनात को सँवारो, इसे संजोकर रखो। आप (सल्ल०) ने फरमाया: “अगर क़यामत क़रीब हो और तुम्हारे हाथ में पौधा हो, और तुम उसे लगा सकते हो तो उसे ज़रूर लगा दो।” (मुसनद अहमद: 12933) आपने ये भी फरमाया: “कोई मुसलमान ऐसा दरख़्त लगाता है जिससे इंसान, परिन्दा या जानवर फायदा उठाएँ तो वह उसके लिए सदक़ा होता है” (बुख़ारी: 6012)। एक हदीस में है कि हज़रत सलमान फ़ारसी ने अपने मालिक से अपनी ग़ुलामी की रिहाई के लिये 300 खजूर के पौधे लगाना तय कर लिया तो रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने वे तमाम पौधे अपने हाथों से लगाए। (देखें हदीस मुसनद अहमद : 24138) एक और हदीस में रसूलुल्लाह (सल्ल) ने पेड़ लगाने को सदक़ए-जारिया क़रार दिया और फ़रमाया पेड़ लगानेवाले को उस वक़्त तक अजर मिलता रहेगा जब तक लोग उससे फ़ायदा उठाते रहेंगे। (हदीस मजमउल-ज़वाइद : 4739) एक और हदीस में है कि जब कोई बन्दा कोई पेड़ लगाता है तो उसे उतना ही अज्र मिलता है जितना उसमें फल निकलता है। (मजमउल-ज़वाइद : 6266) ख़ुद क़ुरआन में अल्लाह ने और हदीसों में रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़ुज़ूल-ख़र्ची से दूर रहने की तलक़ीन की ताकि अल्लाह की नेमतों का सही इस्तेमाल हो सके। चुनांचे वुज़ू करते वक़्त भी आपने पानी फ़ुज़ूल बहाने से मना किया, चाहे आदमी दरिया के किनारे ही क्यों न हो (इब्ने माजा: 425)। क़ुरआन ने भी साफ़ तौर पर फ़रमाया: “बेशक फ़ुज़ूलख़र्च लोग शैतान के भाई हैं” (सूरह बनी इस्राईल: 27)। यानी जब इंसान पानी, खाना, हवा, लकड़ी, ऊर्जा जैसी क़ुदरती नेमतों में फ़ुज़ूल-ख़र्ची करता या बरबाद करता है तो वो शैतानी अमल करता है, और यही माहौलियाती बोहरान की जड़ है। साफ-सफ़ाई को आधा ईमान क़रार दिया (सहीह मुस्लिम: 223) ताकि खाने और पीने की चीज़ों को साफ़ सुथरा रखा जा सके जिससे माहौलियाती आलूदगी से पूरी तरह बचा जा सके। हरियाली को क़ायम रखने, पेड़ लगाने और ज़मीन को महकाने की ताकीद की और इसे इबादत का हिस्सा क़रार दिया। ऊपर की एक हदीस से ये बात वाज़ेह हो गई कि अगर कोई शख़्स पेड़ लगाए और उससे कोई परिन्दा खाए तो ये भी एक सदक़ा है। इसलिये हमारी ये ज़िम्मेदारी है कि इस बाग़ को बर्बाद करने की बजाय इसे सँवारेँ। इसमें पेड़ लगाएँ, पानी साफ़ रखें, ज़मीन को महकाएँ, जानवरों का हक़ अदा करें और खाने-पीने व दूसरी नेमतों को बरबाद न करें। यही अल्लाह की रज़ा का रास्ता है, और यही हमारी दुनिया और आख़िरत दोनों की ख़ूबसूरती का राज़ है। तो आइये हम सब मिलकर माहौलियाती आलूदगी को दूर करें, अल्लाह के इस चमन को पेड़ों से महकाएँ ताकि ये दुनिया भी ख़ूबसूरत बनी रहे और हमारा रब भी हमसे राज़ी हो जाए ताकि इस बाग़ (दुनिया) से बेहतर बाग़ (जन्नत) के हम हक़दार क़रार पाएँ।

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जो देता है, वही जीता है एक समय की बात है, एक हरे-भरे जंगल में एक बड़ा और ख़ूबसूरत सा आम का पेड़ था, जिसका नाम “असख़िया” था। उसकी घनी शाख़ाएँ बादलों को छूती मालूम होती थीं, और उसकी चौड़ी, सायादार टहनियाँ मानो किसी को भी अपनी आग़ोश में लेने के लिए तैयार रहती थीं। असख़िया अपने मीठे और रसीले फलों के लिए दूर-दूर तक मशहूर था। जब हवा चलती, तो उसकी पत्तियाँ सरसराती हुई ऐसे लगतीं जैसे कोई मधुर गीत गा रही हों। असख़िया की शाख़ाओं पर बुलबुल अपना घोंसला बनाकर अपने नन्हे बच्चों को चहचहाना सिखाती, तो कोयल अपनी सुरीली आवाज़ में गीत गाकर पूरे जंगल को मंत्रमुग्ध कर देती। उसकी टहनियों पर नन्ही चिड़ियाँ झूला झूलतीं, गिलहरियाँ उछल-कूद करतीं, और मोर अपनी रंगीन पूँछ फैलाकर नाचते। उसकी जड़ों के पास हिरन और ख़रगोश आराम करते, तो बन्दर उसकी डालियों पर उधम मचाते। गर्मी के मौसम में मुसाफ़िर उसकी घनी छाँव में बैठकर राहत पाते, और बच्चे उसके नीचे बैठकर कहानियाँ सुनते। सुबह की पहली किरण के साथ ही ओस की बूँदें उसकी पत्तियों पर मोतियों की तरह चमक उठतीं, और जैसे ही सूरज ऊपर चढ़ता, उसकी छाँव में ठंडी हवा बहने लगती, जिससे हर कोई राहत महसूस करता। उसकी डालियों से टपकने वाली मीठी आमरस की बूँदों पर तितलियाँ मँडरातीं, और कभी-कभी एक नटखट तोता आकर उसका मीठा आम चोंच में दबाकर उड़ जाता। असख़िया के पास जो भी आता, वह उसे अपनी छाँव, अपने फल और अपनी ठंडी हवा का तोहफ़ा दिए बिना जाने न देता। वह दूसरों की मदद करके बेहद ख़ुश रहता, क्योंकि उसकी ज़िंदगी का यही मक़सद था—सबको ख़ुशी और सुकून देना। असख़िया को इस बात पर बहुत इत्मीनान होता था कि वह दूसरों की ज़रूरतें पूरी कर पा रहा है। एक दिन, जंगल में कपट नाम का एक कौआ आया। कपट ने असख़िया को देखा और सोचा, "यह पेड़ जितना बड़ा और फलदार है उससे कहीं ज़्यादा फ़ैयाज़ और सख़ी है। अगर मैं इसे अपने जाल में फँसा लूँ, तो इसका सारा फल मैं अपने हिसाब से इस्तेमाल कर सकता हूँ।" कपट ने मुस्कुराते हुए असख़िया से कहा, "असख़िया, यार तुम बहुत फ़ैयाज़ और दानी हो, लेकिन क्या तुम्हें पता है कि यह जंगल तुम्हारी फ़ैयाज़ी और सख़ावत का नाजायज़ फ़ायदा उठा रहा है? बहुत जल्द तुम्हारे फल ख़त्म हो जाएँगे, और तुम्हें कोई याद भी नहीं करेगा। तुमसे से पहले भी यहाँ एक 'जव्वाद' नाम का बहुत ही सख़ी (उदार) पेड़ हुआ करता था। वह भी तुम्हारी तरह अपने फल सबको लुटाता रहता था, मगर जब वह बूढ़ा हो गया तो एक दिन बेरहम इन्सानों ने उसे काट दिया। अगर तुम समझदार हो, तो अपने फल सिर्फ़ उन्हीं को दो जो इसके लायक़ हैं। जो तुम्हारा एहसान मानें, तुम्हारी तारीफ़ें करें। बाक़ी सबको मना कर दो।" यह कहकर कपट ने असख़िया की तारीफ़ों के पुल बाँधने शुरू कर दिये। असख़िया को अपनी तारीफ़ें सुनकर शुरू में तो थोड़ी झिझक सी महसूस हुई, लेकिन धीरे-धीरे उसे मज़ा आने लगा। अब तो असख़िया कपट का हो गया और उसने जानवरों और परिन्दों को फल देना बन्द कर दिये। वह सिर्फ़ उन्हीं को फल देता जो उसकी तारीफ़ें किया करते थे। एक दिन हिरन का एक होनहार सा बच्चा असख़िया के पास आया। उसका नाम चंचल था। उसने देखा कि असख़िया के पास चापलूस क़िस्म के परिन्दे बैठे असख़िया की तारीफ़ों के पुल बाँध रहे हैं, और असख़िया बदले में उन्हें एक-एक फल दे देता है। चंचल यह देखकर थोड़ा ठिठका, लेकिन वह असख़िया के पास जाकर बोला, "असख़िया अंकल मेरी दादी बीमार हैं अम्मा ने उनके लिये एक फल मँगाया है। आप मुझे उनके वास्ते एक मीठा सा आम दे दीजिये।" "तुम्हें क्या लगता है यहाँ पर आम फ़्री बँटते हैं, चलो जाओ यहाँ से, यहाँ कोई आम-वाम नहीं मिल रहे हैं।" असख़िया ने तड़ककर जवाब दिया। चंचल इस जवाब की उम्मीद नहीं कर रहा था, वह हैरान हो कर बोला, "अंकल आप तो बिलकुल बदल गए हैं, आप तो पहले ऐसे नहीं थे। आप तो बड़े फ़ैयाज़ और दाता थे।" असख़िया ने कहा, "हाँ, अब मुझे समझ में आ गया है, मैं अपने फल यूँ ही बेकार में बाँट दिया करता था, मेरे फल बेकार थोड़े हैं कि यूँ ही बाँट दूँ। मेरी मेहनत और क़ाबिलियत इनमें लगी है।" चंचल ने बहुत नरमी और मासूमियत के साथ बोला, "क्या कहा अंकल! क्या ये आम सिर्फ़ आपकी मेहनत और क़ाबिलियत का फल हैं?" असख़िया ने अकड़कर जवाब दिया, "हाँ, हाँ! बिल्कुल, ये सब आम मेरी क़ाबिलियत का ही तो फल हैं।" चंचल मुस्कुराया और बोला, "नहीं असख़िया अंकल, ये आपकी बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है। ज़रा सोचिए, अगर सूरज अपनी रोशनी और गर्मी न देता, तो क्या आपकी शाख़ों पर फल लग पाते? सूरज की रोशनी से ही तो आपके पत्तों में फ़ोटोसिंथेसिस होता है, जिससे आपको खाना मिलता है। अगर ये प्रोसेस ही रुक जाए, तो आपकी शाख़ें सूखने लगेंगी और आपकी ज़िन्दगी मुश्किल हो जाएगी।" असख़िया थोड़ा झेंप सा गया, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। चंचल ने आगे कहा, "अंकल ज़रा सोचिये अगर चाँद और सितारे रात को अपनी ठंडक न देते, तो ज़मीन की नमी कैसे बनी रहती? पौधों को सिर्फ़ धूप ही नहीं, बल्कि ठंडक और रात की नमी भी चाहिए ताकि गर्मी और ठण्डक का बैलेंस बना रहे। और अगर बारिश न होती, तो आपकी जड़ें कैसे पानी पीतीं? आपको पता है कि ज़मीन से पानी चूसकर ऊपर तक पहुँचाने के लिए आपकी जड़ों में कैपिलरी एक्शन और ट्रांसपिरेशन पुल काम करता है? अगर ये प्रोसेस न होता तो आप कभी भी फल नहीं दे पाते।" अब असख़िया गहरी सोच में पड़ गया। "आपको मालूम है ज़मीन ने आपको मज़बूती दी, आपकी जड़ों को सहारा दिया, और आपको Nutrients (पोषक तत्व) दिए। मिट्टी में मौजूद नाइट्रोजन, फ़ॉस्फ़ोरस, और पोटैशियम जैसे मिनरल्स आपको बढ़ने में मदद करते हैं। हवा ने आपकी पत्तियों को ताज़गी दी, ताकि आपकी शाख़ों स्टोमाटा (छिद्र) से गैसें आ-जा सकें। मधुमक्खियों और तितलियों ने आपके फूलों में पॉलिनेशन किया, जिससे आपके फल बन सके। अगर ये सब न होते, तो क्या आप अकेले ही इतने मीठे और रसीले आम दे पाते?" असख़िया को जैसे किसी ने अथाह गहराइयों में गिरने से थाम लिया हो। उसने अपनी शाख़ों को देखा, फिर आसमान की तरफ़ और फिर ज़मीन की तरफ़। पहली बार उसे अहसास हुआ कि सच में, ये सब कुछ अकेले उसकी मेहनत का नतीजा नहीं था। उसे सूरज, चाँद, ज़मीन, बारिश, हवा और न जाने कितनी और चीज़ों का सहारा मिला था। वह गहरी सोच में पड़ गया कि आख़िर उसे किस बात का ग़ुरूर हो गया था। चंचल मुस्कुराया और बोला, "देखा असख़िया अंकल, असल ख़ुशी देने में है, न कि एहसान जताने में। जिस तरह ये सारी चीज़ें आपको बिना किसी शर्त के देती हैं, वैसे ही आपको भी देना चाहिए।" "और हाँ अंकल! हमने आप जैसे ही बुज़ुर्गों से सुना है कि देता वही है जो ज़िन्दा होता है, जो मर जाता है वो देना भी भूल जाता है। और जो इसलिये देता है कि लोग उसकी तारीफ़ें करें तो इस पूरे जंगल का मालिक उसे औंधें मुँह भड़कती आग में झुलसा देगा।" असख़िया की आँखें नम हो गईं। उसे लगा जैसे किसी ने उसे ज़िन्दगी लौटा दी हो। उसने धीरे से अपनी शाख़ झुकाई और बहुत प्यार से सबसे मीठा आम चंचल को पेश कर दिया। उसने उसी वक़्त फ़ैसला किया कि वह फिर से पहले की तरह खुले दिल से अपने फलों को बाँटेगा। उस दिन के बाद, असख़िया फिर से पहले की तरह दरियादिल हो गया। उसके आम खाने वाले परिन्दे और जानवर लौट आए, और जंगल फिर से ख़ुशहाल हो गया।

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*हूर* इस्लाम में "हूर" का तसव्वुर एक वसीअ और गहरा मअनी रखता है, जिसे अक्सर महज़ ज़ाहिरी हुस्न व जमाल के तनाज़ुर में पेश किया जाता है, हालाँकि इसका ताल्लुक़ सिर्फ़ जिस्मानी ख़ूबसूरती से नहीं, बल्कि रूहानी पाकीज़गी, ज़ेहनी तहारत और अख़लाक़ी बुलंदी से है। हमारे समाज में एक बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी पैदा की गई है कि "हूर" का ज़िक्र जन्नत की ख़ूबसूरत औरतों के बारे में किया गया है। हक़ीक़त में, क़ुरआन व हदीस और अरबी लुग़त में "हूर" का जो मअनी बयान किया गया है, वो इस सतही तशरीह से बहुत बुलंद है। हूर लफ़्ज़ अरबी ज़बान के 'ह व र' से बना है। इस रूट (माद्दे) से क़ुरआन मजीद में जो अलफ़ाज़ इस्तेमाल हुए हैं वो चार मअना में इस्तेमाल हुए हैं। एक है 'यहूर' इसका मतलब पलटना लिया गया है : اِنَّہٗ ظَنَّ اَنۡ لَّنۡ یَّحُوۡرَ उसने समझा था कि उसे कभी पलटना नहीं है। (84 : 14) दूसरा लफ़्ज़ है 'तहावुर' और 'युहाविर' इसका मतलब बातचीत लिया गया है : قَدۡ سَمِعَ اللّٰہُ قَوۡلَ الَّتِیۡ تُجَادِلُکَ فِیۡ زَوۡجِہَا وَ تَشۡتَکِیۡۤ اِلَی اللّٰہِ ٭ۖ وَ اللّٰہُ یَسۡمَعُ تَحَاوُرَکُمَا ؕ اِنَّ اللّٰہَ سَمِیۡعٌۢ بَصِیۡرٌ अल्लाह ने सुन ली उस औरत की बात जो अपने शौहर के मामले में तुमसे तकरार कर रही है और अल्लाह से फ़रयाद किए जाती है। अल्लाह तुम दोनों की बातचीत सुन रहा है, वो सब कुछ सुनने और देखनेवाला है। (58 : 1) قَالَ لَہٗ صَاحِبُہٗ وَ ہُوَ یُحَاوِرُہٗۤ اَکَفَرۡتَ بِالَّذِیۡ خَلَقَکَ مِنۡ تُرَابٍ ثُمَّ مِنۡ نُّطۡفَۃٍ ثُمَّ سَوّٰىکَ رَجُلًا उसके पड़ोसी ने बातें करते हुए उससे कहा, “क्या तू कुफ़्र (नाशुक्री) करता है, उस ज़ात से जिसने तुझे मिट्टी से और फिर नुत्फ़े से पैदा किया और तुझे एक पूरा आदमी बना खड़ा किया? (18 : 37) तीसरा है 'हवारी' ये लफ़्ज़ हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के साथियों के लिए इस्तेमाल हुआ है : فَلَمَّاۤ اَحَسَّ عِیۡسٰی مِنۡہُمُ الۡکُفۡرَ قَالَ مَنۡ اَنۡصَارِیۡۤ اِلَی اللّٰہِ ؕ قَالَ الۡحَوَارِیُّوۡنَ نَحۡنُ اَنۡصَارُ اللّٰہِ ۚ اٰمَنَّا بِاللّٰہِ ۚ وَ اشۡہَدۡ بِاَنَّا مُسۡلِمُوۡنَ जब ईसा ने महसूस किया कि बनी-इसराईल कुफ़्र और इनकार पर आमादा हैं तो उसने कहा, “कौन अल्लाह की राह में मेरा मददगार होता है?” हवारियों ने जवाब दिया, “हम अल्लाह के मददगार हैं, हम अल्लाह पर ईमान लाए, गवाह रहो कि हम मुस्लिम [अल्लाह के फ़रमाँबरदार] हैं। (3:52) और चौथा है 'हूर' ये लफ़्ज़ जन्नती औरतों के लिए इस्तेमाल हुआ है (हालाँकि इसे औरतों और मर्दों दोनों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है): وَ حُوۡرٌ عِیۡنٌ "और ख़ूबसूरत आँखों वालियाँ" (56 : 22) مُتَّکِئِیۡنَ عَلٰی سُرُرٍ مَّصۡفُوۡفَۃٍ ۚ وَ زَوَّجۡنٰہُمۡ بِحُوۡرٍ عِیۡنٍ “वो आमने-सामने बिछे हुए तख़्तों पर तकिये लगाए बैठे होंगे और हम उनका जोड़ा बना देंगे ख़ूबसूरत आँखों वालियों के साथ। (52 : 20) کَذٰلِکَ ۟ وَ زَوَّجۡنٰہُمۡ بِحُوۡرٍ عِیۡنٍ “और इस तरह हम उनका जोड़ा ख़ूबसूरत आँखोंवालियों के साथ बना देंगे। (44 : 54) आइये अब इस लफ़्ज़ की तहक़ीक़ और तफ़्सीली मालूमात हासिल करते हैं। अरबी ज़बान में "हूर" का मतलब "लौटना, घूमना, वापस होना, या एक हालत से दूसरी हालत में बदल जाना" है। इसी से लफ़्ज़ 'महवर' बना है, महवर उस धुरी को कहते हैं जिस पर कोई चीज़ घूमती है, चक्कर लगाती है। इसी से लफ़्ज़ 'मुहावरा' बना है, इसका मतलब होता है कि कोई ऐसी बात जिसे लोगों ने बार-बार के इस्तेमाल से किसी मुतय्यन माना के लिए ख़ास कर लिया हो। इसी से ‘तहावुर’ बातचीत के लिये इस्तेमाल किया जाता है। इसका मतलब बातचीत भी इसीलिये लिया गया है कि बातचीत बार बार पलटाई जाती है। एक मतलब ये भी लिया गया है कि हूर का मतलब सफ़ेद होना भी है। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के साथियों को हवारी कहा गया है। इस सिलसिले में एक राय तो ये है कि वे चूँकि धोबी थे इसलिये उन्हें हवारी कहा गया है। (ग़ालिब गुमान ये है कि धोबी चूँकि कपड़ों को बार-बार पलटकर उसको साफ़ और सफ़ेद कर देता है इसीलिये उसे हवारी कहा जाने लगा) दूसरी राय ये है कि उनकी अपनी पाकी और सफ़ाई की वजह से उन्हें हवारी कहा जाता है और इसी से ये बात भी समझी गई है की उनकी नीयत के इख़लास, किरदार की पाकीज़गी और फ़िक्र की सुथराई की वजह से उन्हें हवारी कहा गया है। एक बात और समझने की है कि हूर लफ़्ज़ जमा (Plural) है, इसका वाहिद (Singular) 'अहवर' है जो कि मुज़क्कर और 'हौरा' भी है जो कि मुअन्नस है। यानी हूर लफ़्ज़ मुज़क्कर और मुअन्नस दोनों के लिए इस्तेमाल होता है। 'अल-हौर' का मतलब है आँख की सफ़ेदी का बहुत सफ़ेद और स्याही का बहुत स्याह होना और जिस्म की खाल का बहुत साफ़ होना। यानी ऐसे मर्द और औरतें जिनमें ये ख़ुसूसियात पाई जाएँ हूर कहलाएँगे। साफ़ ज़ाहिर हो गया कि हूर का मतलब सिर्फ़ ख़ूबसूरती नहीं, बल्कि सफ़ाई, लताफ़त और इख़लास भी है। आँख की सफ़ेदी और सियाही का तवाज़ुन, नीयत की पाकीज़गी, किरदार की मज़बूती और ज़ेहनी व रूहानी तहारत सब इस लफ़्ज़ के मअनी में शामिल हैं। राग़िब असफ़हानी और इब्ने फ़ारिस जैसे माहिरीने-लुग़त के मुताबिक़, "हूर" न सिर्फ़ जिस्मानी तौर पर हसीन होने का तसव्वुर रखता है, बल्कि इसमें अ़क़्ल व फ़िक्र की सफ़ाई और किरदार की बुलंदी भी शामिल है। क़ुरआन में जन्नती मुआशरे की पाकीज़ा सिफ़ात को बयान करने के लिए "हूर" का इस्तेमाल हुआ है, जो एक ऐसे दोस्ताना माहौल की निशानदेही करता है जहाँ बाहमी ताल्लुक़ात किसी भी तरह की बदनीयती, धोका या फ़रेब से पाक होंगे। "व-ज़व्वज्नाहुम बिहूरिन-ईन" (अत-तूर : 20) में "ज़ौज" का मतलब महज़ निकाह करना नहीं, बल्कि हम-नशीनी, पाकीज़ा रफ़ाक़त और बेहतरीन सोहबत है। जन्नत में अल्लाह के नेक बंदों को ऐसी हम-नशीनी और दोस्ती नसीब होगी जो हर तरह की गन्दगियों और दुनियावी कमज़ोरियों से पाक होगी। जिस तरह दुनिया में एक अच्छा दोस्त, एक सच्चा साथी और एक मुख़लिस हमसफ़र ज़ेहनी सुकून का बाइस होता है, उसी तरह जन्नत में "हूर" का तसव्वुर सिर्फ़ एक साथी के तौर पर नहीं, बल्कि रूहानी और ज़ेहनी हमआहंगी के इज़हार के लिए भी आया है। ये बात भी क़ाबिले-ग़ौर है कि पूरे क़ुरआन और सही तरीन हदीसों में "72 हूरों" का कहीं कोई ज़िक्र नहीं मिलता। ये तसव्वुर इस्लामी तालीमात की सही समझ से हटकर एक अफ़्साना बन गया है, जिसका इस्तेमाल ख़ास तौर पर नौजवानों को गुमराह करने और उन्हें जिहाद के नाम पर ग़लत रास्तों पर ले जाने के लिए किया जाता है। जो लोग 72 हूरों का लालच देकर किसी भी क़िस्म के जिहाद की तरग़ीब देते हैं, वो सरासर एक तख़रीबी और क़ुरआन व हदीस की मनशा के बिल्कुल ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं। इस्लाम में जिहाद का असल मक़सद इंसाफ़, अद्ल, और अमन क़ायम करने की जिद्दोजुहद करना है, न कि जन्नत के नाम पर झूटी उम्मीदें देकर नौजवानों को अपने नापाक इरादों के लिए इस्तेमाल करना। ये एक सरासर घड़ा हुआ प्रोपेगेंडा है कि इस्लाम में "हूर" का ज़िक्र नौजवानों को जिहाद के लिए तैयार करने की ग़रज़ से किया गया है। जिहाद का हक़ीक़ी मक़सद तो ये है कि एक मोमिन ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खड़ा हो, मुआशरे में अम्न व सलामती को क़ायम करे और अद्ल व इंसाफ़ को बहाल करे। इस्लामी तालीमात के मुताबिक़, जन्नत की नेमतें हर उस शख़्स के लिए हैं जो नेकी, इख़लास, सब्र और अद्ल के असूलों पर चलता है। क़ुरआन की रोशनी में, जन्नत का वादा उन लोगों के लिए है जो अल्लाह की रज़ा के लिए ज़िंदगी गुज़ारते हैं, न कि महज़ किसी जिस्मानी लालच के तहत। "हूर" का ज़िक्र दरअस्ल इस बात की अलामत है कि जन्नत में हर शख़्स को ऐसा माहौल मयस्सर होगा जहाँ जिस्मानी, रूहानी और ज़ेहनी सुकून अपने बेहतरीन दर्जे पर होगा। जहाँ मर्दों को उनकी बीवियाँ और औरतों को उनके शौहर हम-नशीन और हम-फ़िक्र मिलेंगे और आस-पास जो लोग होंगे वो भी हम-फ़िक्र और बेहतरीन किरदार के होंगे। इस्लाम में जन्नत की बशारत दरअस्ल अल्लाह के क़ुर्ब, अमन व सुकून और एक मुकम्मल, बे-ऐब और पाकीज़ा ज़िंदगी के वअदे पर मबनी है। "हूर" का तसव्वुर इसी पाकीज़गी, हमआहंगी और ज़ेहनी व रूहानी सुकून व इत्मीनान की अलामत है। जन्नत का वो माहौल— जहाँ न कोई धोका होगा, न मकारी, न फ़रेब और न ही किसी क़िस्म की नापाकी— एक ऐसा माहौल होगा जहाँ हर ताल्लुक़ इख़लास, मोहब्बत और ख़ैर-ख़्वाही पर मबनी होगा। यही वो हक़ीक़त है जिसे समझने और अपनाने की ज़रूरत है ताकि इस्लाम के हक़ीक़ी पैग़ाम को उसकी असल रूह के मुताबिक़ आम किया जा सके। इन्तिहाई अफ़सोस की बात है कि आज भी हमारी मस्जिदों के मेंबर से बहुत से वाइज़ तक़रीर करते हुए जन्नत में हूरों की ख़ूबसूरती को बहुत ही बेहूदा तरीक़े से बयान कर रहे होते हैं, और इसके लिए दलील ये पेश करते हैं कि इस तरह की बातें हदीसों में आई हैं और ये सब जन्नत की ख़ाहिश पैदा करने के लिये करते हैं ताकि लोग नेक अमल करने की तरफ़ मायल हों। हालाँकि इस क़िस्म की सभी हदीसें इन्तिहाई कमज़ोर और मन-घड़न्त हैं। नेकी की तरफ़ मायल करने के लिये अल-हम्दुलिल्लाह क़ुरआन काफ़ी है।

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Haiz k dauran Quran padhna

*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़

Hadees

हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है

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